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मानव कौल के लिए लिखना क्या है? आइए जानते हैं उनसे उनके शब्दों में।

20 सालों से मुंबई में फ़िल्मी दुनिया, अभिनय, नाट्य-निर्देशन और लेखन का अभिन्न हिस्सा बने हुए हैं।

मानव कौल के लिए लिखना क्या है? आइए जानते हैं उनसे उनके शब्दों में।

कश्मीर के बारामूला में पैदा हुए मानव कौल, होशंगाबाद (म.प्र.) में परवरिश के रास्ते पिछले 20 सालों से मुंबई में फ़िल्मी दुनिया, अभिनय, नाट्य-निर्देशन और लेखन का अभिन्न हिस्सा बने हुए हैं। अपने हर नए नाटक से हिंदी रंगमंच की दुनिया को चौंकाने वाले मानव ने अपने ख़ास गद्य के लिए साहित्य-पाठकों के बीच भी उतनी ही विशेष जगह बनाई है। इनकी पिछली चारों किताबों—‘ठीक तुम्हारे पीछे’, ‘प्रेम कबूतर’, ‘तुम्हारे बारे में’ और ‘बहुत दूर, कितना दूर होता है’ को पाठकों का अथाह प्यार मिला है। चलता-फिरता प्रेत इनकी पाँचवीं और कहानियों की तीसरी किताब है।.

1. मानव कौल के लिए लिखना क्या है?

जीने के समीकरण में हर चौराहे की संभावनाएँ असीम हैं। अधिकतर सुरक्षित जीने में हम सरलता चुनते हैं और कम नाटकीयता की तरफ़ मुड़ते जाते हैं। इसलिए जब लोग सवाल करते हैं कि क्या यह कहानी आपके जीवन पर आधारित है तो मैं उनसे कहता हूँ काश, मेरा जीवन इतना समृद्ध होता! एक लालसा हमेशा रही है कि मैं जीने की प्रक्रिया में थोड़ा ज़्यादा जी लूँ। चौराहे पर कम नाटकीयता की तरफ़ मुड़ूँ, पर उन सारी संभावनाओं को भी जी लूँ जो बाक़ी रास्तों ने अपने भीतर संजोकर रखी हैं। इसलिए शायद मैं लिखने लगा। मैं अधिकतर उस संसार को छूना चाहता था जिसका यह संसार प्रतिबिंब है।

2. लिखकर आप ख़ाली होते हैं या भर जाते हैं?

मेरे लिखते ही सारा का सारा गढ़ा हुआ संसार छूट जाता है। वह इतना पराया-सा हो जाता है कि मैं कई बार अपना ही लिखा पढ़ते हुए कहता हूँ कि ‘वाह! सही लिखा है जिसने भी लिखा है।’ मैं इसे ख़ाली हो जाना नहीं कहूँगा। ख़ाली होना मुझे हमेशा अच्छा लगता है। ख़ाली जगह रखना बहुत महत्त्वपूर्ण है। इसे आप प्रतीक्षा की तरह भी देख सकते हैं। मैं हमेशा किसी नए के इंतज़ार में रहता हूँ, कुछ ऐसा हो जो पहले कभी नहीं हुआ हो। इसमें मेरे पुराने लिखे का परायापन बहुत अच्छा काम करता है। मैं सारा कुछ यूँ ही लिख रहा होता हूँ जैसे पहली बार कुछ लिखने की कोशिश करता हूँ।

3. आपकी किताबों के शीर्षक बेहद दिलचस्प होते हैं। यह भी लिखने की तरह स्वतः हो जाता है या इसके लिए ख़ूब कसरत करनी पड़ती है?

कभी कहानी अपना शीर्षक पहले दे देती है तो कभी शीर्षक पूरी कहानी में पसरा पड़ा होता है और आप उसे देख नहीं पाते। मेरे लिए शीर्षक हमेशा कहानियाँ स्वयं निश्चित करती हैं। इसमें मैं कभी भी कोई प्रयास नहीं करता हूँ।

Manav Kaul

4. लिखने में भाषा (हिंदी) एक अड़चन है या सहूलियत?

मुझे लगता है कि भाषा महज़ एक ज़रिया है। अच्छी भाषा हमेशा आकर्षित करती है, पर अंत में मुझे वह अलंकार से ज़्यादा महत्त्वपूर्ण नहीं लगती। आप उन सारे अलंकारों के बीच क्या और क्यों लिख रहे हैं, वह हमेशा महत्त्वपूर्ण होता है।

5. आपने मृत्यु पर बहुत लिखा है। इस किताब की भी कुछ कहानियाँ मृत्यु को समझने की कोशिश करती हैं। ‘जीवन’ के बजाय ‘मृत्यु’ को लिखने ने आपको किस तरह आकर्षित किया?

मैं एक बार न्यूयॉर्क में सड़कों के बीचो-बीच लगी हुई बेंच पर बैठकर अपनी सुबह की कॉफ़ी पी रहा था। मेरे अगल-बग़ल से ढेरों लोग अपने काम पर जाते हुए दिख रहे थे। अचानक मुझे यह ख़याल आया कि आज से महज़ तीस साल बाद एक पूरी नई जेनरेशन इन सबको बदल देगी। मेरे जैसा कोई और व्यक्ति इस बेंच पर बैठा होगा और इन जैसे ढेरों लोग इसी तरह अपने काम पर जा रहे होंगे। कुछ नहीं बदलेगा और सारा कुछ बदल चुका होगा। शायद यही वह क्षण था जब मृत्यु से मेरा संबंध कुछ अलग मायने फेंकने लगा था। मैं इसे कुरेदना चाहता था। मैं इसके थोड़ा और गहरे उतरना चाहता था हमेशा से ही। पर मैंने जितना मृत्यु को लिखना चाहा है, उतना मेरे कहानियों में जीवन भरता गया है।

6. लोग आपके लिखे को पागलपन की तरह पसंद करते हैं। इसको कैसे सँभालते हैं आप?

मैं बिलकुल नहीं सँभालना चाहता हूँ। मैं दूर रहना चाहता हूँ। क्योंकि वे लोग जिसको इस सारे लिखे का श्रेय देते हैं, वह मैं नहीं हूँ।

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News4Bharat Desk

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