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दोस्ती का नाम जिंदगी… जिंदगी का नाम दोस्ती

दोस्ती के प्रतीक के रूप में मनाये जाने वाले इस दिन की शुरुआत वर्ष 1919 में हॉलमार्क कार्ड के जोस हॉल के सुझाव से हुई थी. सन 1935 ई. में पहली बार यूनाइटेड स्टेट्स कांग्रेस ने अगस्त के पहले रविवार को फ्रेंडशिप डे मानाने की घोषण की थी. इसे पहली बार अमेरिका में मनाया गया था.

यूँ तो चंद अक्षरों से मिलकर बना है ये शब्द…. पर इसके अर्थों को बयां करना और सूर्य की रौशनी को मुट्ठी में समेटना दोनों बराबर है. दोस्ती….. आपके जहन में यह शब्द आते ही आप उस इंसान को याद करने लगते हैं. जिससे आप दिल खोल कर बातें शेयर कर सकते हैं, जिसके साथ आप क्वालिटी टाइम स्पेंड कर सकते हैं. और जिसके साथ आप जी भर के लड़-झगड़ सकते हैं, जो आपके हर सिचूऐशन में साथ हो…..

जो आपके दुःख में काम आये, जो आपके खुशनुमा लम्हों को भी यादगार बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ता हो. यूँ कहें तो रिश्तों की एक ऐसी सम्पति जो अन्य रिश्ते-नाते की तरह विरासत में नहीं मिलती बल्कि इसे अपने विचार, व्यवहार, समर्पण, माफ करने की काबिलियत के दम पर कमाया जाता है.

बीतते ज़माने के साथ- साथ तेजी से बदलते इस तकनीकी युग में दोस्ती के ट्रेंड भी बदले है. आज-कल की दोस्ती स्कूल कॉलेजों से निकल कर वेब की दुनिया में आ गया है. जहाँ एक ओर विज्ञान ने हमें जिन्दगी की सफ़र में पीछे नहीं होने दिया तो वहीँ दूसरी ओर इसने हमारी जिन्दगी से वक्त छीन लिया है .

यहाँ तक की इस तकनीकी दुनिया ने अपने परिवारों से भी मिलने -जुलने की समय को छीन लिया है. इस नए तकनीक ने दोस्ती के मायने को भी बदल दिया है. इसमें कुछ नकारात्मक बदलाव भी आए हैं. अब वक़्त और जगह के हिसाब से लोग दोस्ती करने में रूचि रखने लगे है. दोस्ती निस्वार्थ भाव से की जाती है. लेकिन बदलते समय ने दोस्ती में स्वार्थ की भावना को जन्म दिया है.

 

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